Tag Archives: ग़ज़ल

ज़ख्म तो भर गया मगर

रब की तो मेहरबानि-ओ-इनायत बनी रही। हमसे जमाने को मगर शिकायत बनी रही।। Advertisements

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तेरे हिज्र में अपना दामन भिगोता रहा

तेरे हिज्र में अपना दामन भिगोता रहा। मैं शब-ए-ग़म की तन्हाई में रोता रहा।।

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सदा-ए-दिल को भी मेरी, तराना क्यों समझता है

सदा-ए-दिल को भी मेरी, तराना क्यों समझता है। नहीं मालुम मुझे शायर, ज़माना क्यों समझता है।।

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चाहत के परदे पे मेरी उम्मीदों के सितारे हैं

चाहत के परदे पे, मेरी उम्मीदों के सितारे हैं। कुछ ख्वाब हैं दिल में, कुछ पलकों पे नजारे हैं।।

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