शेर

न कोई हशरत है दिल में न कोई अरमान बाकी है।
मयकदे में देख हालत-ए-“प्रदीप” परेशान साकी है।।

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उनसे मिली नज़र तो नज़ारों की क्या कहें।
दीदार-ए-चाँद हो तो सितारों की क्या कहें।।

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लिखे थे ख़त कभी जो एक दूजे के लिए हमने,
मेरे तुम तक नहीं पहुँचे, तेरे हम तक नहीं आये।।

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अब लाख मिल जायें सोहरत-ए-जहाँ तो क्या “प्रदीप”,
हमारी चाहत तो वो थी, जो कभी हमारी नहीं हुई।।

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देखता हूँ आईना तो इक अक्स नज़र आता है।
मुझे हर नज़र में, बस वो शख्स नज़र आता है।।

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आशिक कभी मुन्तजिर-ए-मोजिजा नहीं होते,
दीवानों के लिये उनकी दीवानगी ही काफी है।।

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मुहब्बत की फिज़ाओं से, अदावत कर नहीं पाया।
दिल-ए-नादाँ कभी उससे, बगावत कर नहीं पाया।।

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सजदे को इबादत, इबादत को बंदगी लिखा।
जब भी लिखा, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी लिखा।।

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ज़िन्दगी तेरी इक अदा दिलकश लगी।
तू जब भी लगी, सदा कशमकश लगी।।

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आगाज़ से शुरुआत कर अंज़ाम पे लिखने लगा।
बिखरकर इश्क में “प्रदीप” ज़ाम पे लिखने लगा।।

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