न ज़िन्दगी की तमन्ना

न ज़िन्दगी की तमन्ना, न खौफ़ शहादत का है।
आज कुछ रंज दिल में, है तो बगावत का है।।

गुल-ए-गुलिस्ता हूँ, गुलशन को आबाद रखूँगा,
अब नादाँ नहीं रहा, मुझे इल्म सियासत का है।।

बावफ़ा निभाऊँगा, जो किरदार मिला है मुझे,
भूला नहीं, ख्याल मुझको, मेरी विरासत का है।।

रखूँगा महफूज उनको, जिन्हे आसरा है मिरा,
खुद से ज्यादा ख्याल, मुल्क की अमानत का है।।

कुर्बान हो जाऊँ वतन पे, तो मुझे ग़म न होगा,
मुझको ऐतवार अब भी, अपनी रिवायत का है।।

लिखने को और भी लिख दूँ, मैं ग़जल में अपनी,
इन्तज़ार “प्रदीप” को मगर, किसी की इज़ाजत का है।।”

प्रदीप कुमार पाण्डेय

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