तेरे हिज्र में अपना दामन भिगोता रहा

तेरे हिज्र में अपना दामन भिगोता रहा।
मैं शब-ए-ग़म की तन्हाई में रोता रहा।।

तमाम रातें हैं चश्मदीद मेरी बदहाली की,
पूछ देखो जागाता रहा या कि सोता रहा।।

तू अनजान था, शायद खबर नहीं होगी,
मेरे दिल पे क्या क्या सितम होता रहा।।

दिल नादान था जमाने को परवाह न थी,
तेरी कशिश में, खुशियों को खोता रहा।।

खता दिल की थी, मुकद्दर का क्या कसूर,
खुद ही तो वीरानियों के बीज बोता रहा।।

भरम है आँखों को, तेरे लौट आने का,
बस इस उम्मीद में ख्वाब संजोता रहा।।

तेरी बातों के खंज़र से ज़ख्मी है “प्रदीप”
ज़ख्म-ए-दिल को साँसों में पिरोता रहा।।

“प्रदीप”

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One Response to तेरे हिज्र में अपना दामन भिगोता रहा

  1. Rakesh sharma says:

    Very very nice

    Heart touching

    Liked by 1 person

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